धैर्य- सबसे बड़ा शस्त्र

धैर्य- सबसे बड़ा शस्त्र

रिपोर्ट- नैनीताल
नैनीताल- महाभारत युद्ध के पश्चात् जब श्रीकृष्ण सहित सभी पांडव गांधारी से मिलने गए तब पुत्रशोक में विह्वल गांधारी ने आंखों की पट्टी के भीतर से ही राजा युधिष्ठिर के पैरों की अंगुलियों के अग्रभाग को एक क्षण के लिए देखा इतने देखने मात्र से ही युधिष्ठिर के पैरों के नाखून काले पड़ गए।
गांधारीजी यह बात अच्छी तरह से जानती थीं कि महाभारत का पूरा युद्ध जिस योद्धा के बलबूते पर लड़ा गया है और जिसके कारण पाण्डवों को विजय मिली है वह श्रीकृष्ण ही हैं अत: गांधारीजी का सारा क्रोध्र श्रीकृष्ण पर ही केन्द्रित हो गया।
वे श्रीकृष्ण को सम्बोधित करती हुई कहती हैं–
‘मधुसूदन! माधव! जनार्दन! कमलनयन! तुम शक्तिशाली थे,तुममें महान बल है,तुम्हारे पास बहुत-से सैनिक थे, दोनों पक्षों से अपनी बात मनवा लेने की सामर्थ्य तुममें थी तुमने वेदशास्त्र और महात्माओं की बात सुनी और जानी हैं यह सब होते हुए भी तुमने स्वेच्छा से कुरुवंश के नाश की उपेक्षा की जानबूझकर इस वंश का नाश होने दिया यह तुम्हारा महान दोष है अत: तुम इसका फल प्राप्त करो।’ .
इतना सब सुनकर भी श्रीकृष्ण शान्त, गम्भीर और मौन रहे। गांधारी के क्रोध ने प्रचण्डरूप धारण कर लिया और वे नागिन की भांति फुफकार कर बोली–

‘चक्रगदाधर! मैंने पति की सेवा से जो कुछ भी तप प्राप्त किया है उस तपोबल से तुम्हें शाप दे रही हूँ–आज से छत्तीसवां वर्ष आने पर तुम्हारा समस्त परिवार आपस में लड़कर मर जाएगा तुम सबकी आंखों से ओझल होकर अनाथ के समान वन में घूमोगे और किसी निन्दित उपाय से मृत्यु को प्राप्त होगे इन भरतवंश की स्त्रियों के जैसे तुम्हारे कुल की स्त्रियां भी इसी तरह सगे-सम्बन्धियों की लाशों पर गिरेंगी।’
ऐसा घोर श्राप सुनकर भला कौन न भय से कांप उठता परन्तु श्रीकृष्ण ने उसी गम्भीर मुस्कान के साथ कहा–‘मैं जानता हूँ ऐसा ही होने वाला है वृष्णिकुल का संहारक मेरे अतिरिक्त और हो भी कौन सकता है? यादवों को देव, दानव और मनुष्य तो मार नहीं सकते अत: वे आपस में ही लड़कर नष्ट होंगे।’
श्राप सुनकर भी भगवान श्रीकृष्ण गांधारी से कहते हैं–’उठो! शोक मत करो प्रतिदिन युद्ध के लिए जाने से पूर्व जब तुम्हारा पुत्र दुर्योधन तुमसे आशीर्वाद लेने आता था और कहता था कि मां मैं युद्ध के लिए जा रहा हूँ तुम मेरे कल्याण के लिए आशीर्वाद दो तब तुम सदा यही उत्तर देती थीं ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ अर्थात् धर्म की जय हो।’
यह कहकर समत्वयोगी श्रीकृष्ण निर्विकार भाव से खड़े रहे और गांधारी मौन हो गयीं।

:- इस प्रसंग का सार यही है कि सुख-दु:ख को मेहमान समझकर स्वागत करें दु:ख में विचलित न होकर धैर्य के साथ उसका सामना करें क्योंकि वाल्मीकि रामायण में कहा गया है–‘दुर्लभं हि सदा सुखम्।’ इसलिए सदा सुखी रहो,विचलित न होवो, दुःख-सुख में योगी भाव में रहो।
यह संदेशपरक लेख रामनगर निवासी अध्यापक संतोष कुमार तिवारी से प्राप्त हुआ।।।

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