धरती के प्रथम पत्रकार- देवर्षि नारद

धरती के प्रथम पत्रकार- देवर्षि नारद

रिपोर्ट- नैनीताल
नैनीताल- देवर्षि नारद पत्रकारिता कर्म के प्रथम व अंतिम प्रस्तोता ऋषि हैं अपनी संपूर्ण मेधा उन्होंने राजा व प्रजा के संबंधों में भरोसा बनाने,अत्याचार और परपीड़ा के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने का श्रेय उनको जाता है।
देवलोक के समस्त देवताओं एवं भगवान विष्णु के अतिप्रिय देवर्षि नारद की जयंती हर वर्ष ज्येष्ठ माह के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को मनायी जाती है शास्त्रों में उल्लेख के अनुसार ‘नार’ शब्द का अर्थ जल होता है देवर्षि जलदान,ज्ञानदान एवं तर्पण में निपुण होने के कारण ‘नारद’ कहलाये।
पौराणिक कथाओं में देवर्षि नारद शापवशात् पूर्वजन्म में गंधमादन पर्वत पर गंधर्व कुल की संतान थे नाम था उपबर्हण।
इस योनि से मुक्ति के लिए उन्होंने संकल्प लिया कि अगले जन्म में वे सृष्टि- निर्माता को पिता तुल्य प्राप्त करेंगे जिसके लिए उन्होंने कठिन तपस्या की और ब्रह्मा को मानसपिता के रूप में प्राप्त कर जगत् में विख्यात हुए ऐसा
उल्लेख मिलता है कि दक्ष प्रजापति के दस हजार पुत्रों को ब्रह्मा जी मोहमाया रचित सांसारिकता का ज्ञान दे रहे थे परंतु नारद ने उन पुत्रों को मोहमाया के बंधन से मुक्ति का मार्ग दिखा दिया जिससे ब्रह्मा ने कुपित होकर नारद को शाप दे दिया दक्ष प्रजापति ने भी नारद को नष्ट होने का शाप दिया कुछ समय पश्चात् ब्रह्मा का मन नारद को लेकर पिघला उन्होंने दक्ष से नारद को शापमुक्त करने का आग्रह किया तब दक्ष ने कहा कि मैं अपनी कन्या आपको दे रहा हूँ इसका विवाह कश्यपऋषि से होने पर नारद का पुन: जन्म होगा परंतु वह एक जगह ज्यादा देर टिक नहीं पायेगा।
तीनों लोकों में निशिवासर घूमता रहेगा दक्ष का यह कथन सनातन सिद्ध हुआ।

त्रिकालदर्शी देवर्षि नारद को मैत्रेयणी संहिता में आचार्य तो ब्रह्मवैवर्तपुराण में ब्रह्मा के कण्ठ से उत्पन्न और उन्हीं से संगीत की शिक्षा ग्रहण किया का वर्णन मिलता है भगवान विष्णु के परमप्रिय भक्तों में अग्रपांक्तेय होने के कारण वे तीनों लोकों में कहीं भी,कभी भी आ-जा सकते थे उनके एक हाथ में देवदत्ता नामक वीणा और दूसरे हाथ में करताल है| हर क्षण मुखारविन्द से ‘नारायण-नारायण’ की रट लगाते हुए तीनों लोक में विचरते नारद जी भक्त और भगवान के बीच सूत्रधार की भूमिका निभाने वाले एकमात्र देवर्षि हैं।
देवदत्तामिमां वीणां
स्वरब्रह्मविभूतिताम्।
मूर्च्छयित्वा हरिकथां
गायमानश्चराम्यहम्।।
वे संपूर्ण जीवमात्र के दानवी शक्तियों द्वारा उत्पीड़न की दारुणकथा को त्रिदेव तक पहुँचाने में देर नहीं लगाते हैं।
नारद जी को धरती का प्रथम पत्रकार इसी विशिष्ट जनकार्य के लिए कहा जाता है कुछ लोग नारद जी के इस कर्म को कलह पैदा करने की प्रवृत्ति से जोड़कर देखते हैं जो नितांत दुर्भाग्यपूर्ण है उन्हें उसके मर्म को गंभीरता से पहले समझने का प्रयास करना चाहिये।


रामकथा में नारद की भूमिका संक्षिप्त परंतु उपदेशपरक है। एक बार जब नारद के मन में काम को जीत लेने का अहंकारी भाव अंकुरित हुआ तब भगवान विष्णु ने अहंकार-मर्दन के उपक्रम में मायाजनित स्वयंवर-रचना की|जिसमें नारद ने सुदर्शन रूप के लिए विष्णु से अनुरोध किया ताकि राजकुमारी इनका वरण कर सके लक्ष्मी जी स्वयं राजकुमारी का रूप धारण करके विष्णु का वरण करती हैं। नारद भरी सभा में उपहास के पात्र बने क्योंकि उनका चेहरा किसी राजा के समान सम्मोहक न होकर वानर का था उन्होंने जब चेहरा जल में देखा तो गुस्से में आकर विष्णु को पत्नी-वियोग एवं विपदा में वानर के ही काम आने का शाप दे दिया।
रामावतार में वह शाप विष्णुरूप श्रीरामचंद्र जी पर फलित हुआ शाप देने के उपरांत नारद पछताने लगे तब विष्णु जी ने उन्हें समझाया कि वे किसी प्रकार का शोक न करें।
नारद प्रमुख रूप से समस्त ललित कलाओं,परा-अपरा विद्या,औषधीय ज्ञान,योग , संगीत व समस्त शास्त्रों के आचार्यत्व से विभूषित हैं उन्होंने ‘पांचरात्र’ और संगीत प्रधान ग्रंथ ‘नारद संहिता’,जिसमें पचीस हजार श्लोक हैं की रचना की।उत्तराखंड के बदरीनाथ धाम में अलकनंदा नदी के समीप नारद कुंड है ऐसा माना जाता है कि इसमें स्नान करने से मनुष्य का जीवन पवित्र तथा मृत्योपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है।
आज के विषम वक्त में जब मृत्युलोक में कोरोना,ब्लैक फंगस जैसी महामारी लोगों को लीलने पर आमादा है तो
गुफा में बैठकर ध्यान करने वाले ऋषियों के बजाय तीनों लोको की खबर,समस्याएं तथा उसके निदान की युक्ति निकालने वाले देवर्षि नारद का स्मरण बारंबार होना स्वाभाविक है।
उपरोक्त आलेख के लेखक रामनगर निवासी अध्यापक सन्तोषकुमार तिवारी है।

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