प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के बैनरों पर रंग भेद का साया

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के बैनरों पर रंग भेद का साया

रिपोर्ट- नैनीताल
नैनीताल- कल जब मैं हल्द्वानी के दौरे पर था तो मैंने हल्द्वानी के सभी पैट्रोल पंप्स पर प्रधानमंत्री मोदी की गरीब कल्याण अन्न योजना के अंतर्गत मुफ्त मिलने वाले 5 kg. गेंहूँ या चावल योजना के प्रचार-प्रसार को देखा। हालाँकि देश में गरीबों को दिए जाने वाले राशन के प्रचार का यह कोई नया मामला नही है।समय -समय पर केंद्र व राज्य सरकारें अपनी विकास योजनाओं को इसी प्रकार भीड़भाड़ वाले स्थानों में प्रचारित करतीं रहीं हैं।
वर्ष 1947-48 में देश विभाजन के समय ही पंडित नेहरू ने यह सोचा था कि विभाजन व गरीबी का दंश झेल रहे आमजन को राहत देने के लिए कम मूल्यों में सरकारी राशन उपलब्ध कराया जाना चाहिए..तभी से कपड़ा,सीमेंट,गेंहूँ, चावल,मिट्टी का तेल व चीनी बाज़ार से बहुत कम मूल्यों में आमजन को उपलब्ध कराया जाने लगा।
वर्तमान में एक शताब्दी के बाद आयी महामारी के चलते देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई जिस कारण केंद्र की मोदी सरकार ने लगभग 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त राशन उपलब्ध कराने की व्यवस्था की।

केंद्र सरकार की इन प्रचार योजनाओं से आमजन को कोई गुरेज नही होता।अगर इन योजनाओं के प्रचार-प्रसार का मक़सद आमजन को विभिन्न खाद्य योजनाओं से अवगत कराना मात्र होता। लेकिन यह क्या..पैट्रोल पम्प पर लगाये गए करोड़ों के बैनर इस आशय से बदले जा रहे हैं कि इनका रंग टीम मायावती के झंडे के रंग के अनुरूप हो गया..? क्या..इन बैनरों का रंग,मैटर पूर्व में प्रूफ़ रीडिंग करके फाइनल नही किया जाता..? आखिर रंग के फेर में करोड़ों का नुकसान कर महज़ कुछ दिनों बाद ही इन बैनरों को पूरे जोन/ देश से हटा कर नए रंग में लगाना कहाँ तक जायज़ है..?आखिर इस अपव्यय के लिए दोषी कौन है..?


कुलमिलाकर लोकतंत्र में देश की धन संपदा को अनावश्यक रूप से अपव्यय करना कदापि उचित नही कहा जा सकता है।केवल बैनरों के रंग के गलत चयनित होने के कारण उन्हें कम समयांतराल में बदला जाना पूरी तरह से जनता के धन का दुरुपयोग ही कहलाया जाएगा..?केंद्र सरकार द्वारा जितनी धनराशि से आमजन को यह राशन उपलब्ध कराया जा रहा है।अगर इसके प्रचार,बैनरों के रंग बदलने में किये अपव्यय लागत को भी जोड़ दिया जाए तो वास्तविकता में बहुत ज्यादा खाद्यन्न आमजन को उपलब्ध हो सकता था

लेकिन एक सवाल अब भी अपनी जगह विद्यमान है कि आखिर अत्यधिक विज्ञापन और अनावश्यक खर्च करके सरकारें क्यों अपनी ही योजनाओं की लागत बढ़ाती जाती हैं।जबकि आमजन व गरीब देशवासियों को बड़ी लागत खर्च किये जाने के बाद भी बहुत कम फ़ायदे ही मिल पाते हैं..क्या इस मनवांछित रंग घोटाले की जाँच कभी हो पाएगी..दोषियों को दंडित किया जाएगा..अभी भी यह बड़ा सवाल अशेष है…आलेख वरिष्ठ पत्रकार संजय नागपाल की कलम से।।।।

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