“भारतीय संविधान व पर्यावरण संरक्षण” पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन- जितना प्रकृति  से मोहभंग होगा, उतना जीवन कठिन होगा- न्यायमूर्ति  ध्यानी

“भारतीय संविधान व पर्यावरण संरक्षण” पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन- जितना प्रकृति से मोहभंग होगा, उतना जीवन कठिन होगा- न्यायमूर्ति ध्यानी

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रिपोर्ट- संजय कुमार अग्रवाल
अल्मोड़ा- गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण संस्थान अल्मोड़ा ने ‘भारतीय संविधान एवं पर्यावरण संरक्षण’ विषय के तहत ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ के अवसर पर एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया।
कार्यक्रम का उद्देश्य आम जनता के बीच संविधान, पर्यावरण संरक्षण और देश के मौलिक कानूनों के बारे में अधिक जनभागीदारी, पर्यावरण जागरूकता और ज्ञान का विस्तार करना था।
कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख वक्ता माननीय न्यायाधीश यू.सी. ध्यानी ने पर्यावरण से संबंधित संविधान नीतियों का उल्लेख करते हुए जागरूक किया।
उन्होंने बताया कि ‘जितना प्रकृति से हमारा मोहभंग होगा, उतना ही जीवन कठिन होगा’ इसलिए वृक्षों का अनुसरण करके हमें मार्गों के किनारों पर विभिन्न प्रकार के वृक्षों का वृक्षारोपण करना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि संविधान में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में अनुच्छेद 51(क)पर्यावरण के संबंध में है। जिसमें यह स्पष्ट उल्लेखित है कि ‘प्रत्येकराज्य पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन और वन तथा वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा’।
उन्होंने पर्यावरण दिवस मनाने के इतिहास के बारे में बताते हुए कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत साल 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ की और से की गई थी। पर्यावरण दिवस की शुरुआत स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम से हुई थी। इसी दिन यहां पर दुनिया का पहला पर्यावरण सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इस सम्मेलन के दौरान ही संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की भी नींव पड़ी थी। जिसके चलते हर साल विश्व पर्यावरण दिवस आयोजन का संकल्प लिया गया जिससे लोगों को हर साल पर्यावरण में हो रहे बदलाव से अवगत कराया जा सके और पर्यावरण में संतुलन बनाए रखने के लिए लोगों को समय-समय पर जागरुक किया जा सके।
इसी प्रकार अपने बातों से सभी प्रतिभागियों का ध्यान आकर्षित करते हुए उन्होंने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, सतत विकास सिद्धांत, भूमि जल वायु तथा वन संरक्षण से संबंधित अधिनियमों के बारे में विस्तार से बताया। अंत में उन्होंने संदेश प्रस्तुत किया कि ‘कमाल का ताना दिया आज मंदिर में भगवान ने,पर्यावरण से हमेशा मांगते ही आए हो कभी इसका संरक्षण करने की भी सोचा करो’।
चर्चाओं के बाद, प्रतिभागियों द्वारा विभिन्न प्रकार के सवाल जैसे वन नीतियों के को कैसे लागू किया गया; वन पंचायत के कब्जे वाले क्षेत्र में यदि पर्यावरण, वन और वन्य जीवन से संबंधित किसी भी प्रकार का अपराध होता है, तो इन मुद्दों को हल करने के लिए जिला स्तर पर कौन सा विशेष निकाय जिम्मेदार है; सरकार प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूरी तरह से प्रतिबंध क्यों नहीं लगाती; आदी पूछे गए सवालों को माननीय श्री न्यायमूर्ति यू.सी. ध्यानी द्वारा अच्छी तरह से समझाया गया।
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कार्यक्रम के द्वारा प्रतिभागियों को पर्यावरण संरक्षण कानूनों और अधिकारों के बारे में गहन ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिला और युवाओं को जलवायु परिवर्तन नेता बनने की प्रेरणा मिली जिससे वह अपने व्यक्तिगत हिस्से का योगदान देकर प्रकृति की रक्षा करने में मदद कर सकते हैं।
इस दौरान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जे. सी. कुनियाल, डॉ. मिथिलेश सिंह, डॉ. सुमित राय एवं डॉ. कपिल केसरवानी, संस्थान के क्षेत्रीय केंद्रों के वैज्ञानिकों, छात्रों, शोधकर्ताओं, विभिन्न संगठन सदस्य, सहित कुल 180 प्रतिभागियों ने भाग लिया।

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