शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर मुकदमा दर्ज- संत समाज ने उठाई निष्पक्ष जांच की मांग

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर मुकदमा दर्ज- संत समाज ने उठाई निष्पक्ष जांच की मांग

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रिपोर्ट- नैनीताल
नैनीताल- शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ कोर्ट के आदेश पर पुलिस द्वारा मुकदमा दर्ज किए जाने के बाद संत समाज में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। बड़ा उदासीन अखाड़े के श्री महंत सूर्यमुनि ने इस पूरे प्रकरण पर श्री महंत सूर्यगंभीर चिंता जताते हुए कहा कि शंकराचार्य जैसे सर्वोच्च धर्मगुरु पर मुकदमा दर्ज होना केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की भावनाओं से जुड़ा विषय है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी धर्मगुरु — चाहे वे शंकराचार्य हों, मंडलेश्वर हों या महामंडलेश्वर — के विरुद्ध यदि कोई आरोप है तो उसकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। बिना ठोस तथ्यों और गहन पड़ताल के किसी भी तरह की जल्दबाजी न केवल संत समाज बल्कि करोड़ों सनातन अनुयायियों की आस्था को प्रभावित करती है।
श्री महंत सूर्यने कहा कि सनातन परंपरा में चारों शंकराचार्य धर्म के स्तंभ माने जाते हैं, और उन पर लगे किसी भी आरोप का प्रभाव व्यापक स्तर पर पड़ता है। इसलिए आवश्यक है कि इस मामले की जांच निष्पक्षता और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत की जाए, ताकि सत्य सामने आ सके और न्याय की गरिमा बनी रहे।
इस मामले में ईदगाह कमेटी के पूर्व अध्यक्ष हाजी नईम कुरैशी ने भी अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शंकराचार्य कोई सामान्य व्यक्ति नहीं, बल्कि देश के सम्मानित धार्मिक गुरु हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रकार मुकदमा दर्ज किया जाना द्वेष भावना से प्रेरित प्रतीत होता है। कुरैशी ने कहा कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपनी बात रखने की स्वतंत्रता देता है और किसी भी धर्मगुरु के साथ बिना समुचित जांच के इस तरह की कार्रवाई करना संविधान की भावना के विपरीत है। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य केवल हिंदुओं के ही नहीं, बल्कि मुसलमानों सहित सभी समुदायों के लिए सम्मानित व्यक्तित्व हैं। यदि किसी प्रकार का विवाद या आरोप है, तो पहले तथ्यों की गहन जांच होनी चाहिए थी, उसके बाद ही विधिक कार्रवाई की जानी चाहिए थी। उन्होंने यह भी कहा कि देश में किसी भी प्रकार की धार्मिक असहिष्णुता या जल्दबाजी में की गई कार्रवाई सामाजिक समरसता को प्रभावित कर सकती है। ऐसे संवेदनशील मामलों में संतुलन, संवाद और न्यायपूर्ण प्रक्रिया ही लोकतंत्र की असली पहचान है।

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