धुंआ-धुंआ सा वायुमंडल- पिछले 20 सालों से जंगलों में लगी आग से नुकसान व गैसों की मात्रा पर शोध करेगा एरीज- आग से निकले ब्लैक कार्बन से ग्लेशियरों पर भी दूरगामी प्रभाव

धुंआ-धुंआ सा वायुमंडल- पिछले 20 सालों से जंगलों में लगी आग से नुकसान व गैसों की मात्रा पर शोध करेगा एरीज- आग से निकले ब्लैक कार्बन से ग्लेशियरों पर भी दूरगामी प्रभाव

रिपोर्ट- नैनीताल
नैनीताल- चारों तरफ धधकते जंगल,हर ओर धुंआ,पूरा वातावरण धुंध भरा जंगलों की आग ने पहाड़ों की व्याख्या ही बदल दी है।
पहाड़ों की स्वच्छ आबोहवा को जंगलों में लगी आग ने ग्रहण लगा दिया है यहाँ पूरा वायुमंडल में धुंआ-धुंआ सा लगता है।
जंगल तो जल ही रहे है लेकिन अब इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे है पूरे कुमाऊं रीजन में घातक गैसों की मात्रा बढ़ने लगी है।

आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान(एरीज) के वरिष्ठ वायुमंडल वैज्ञानिक डॉ एम के नजा के मुताबिक सामान्यतया वायुमंडल में ब्लैक कार्बन की मात्रा 500 से 1500 नैनोग्राम(ng/m3) के बीच होती है जो इस बीच बढ़कर करीब 12 हजार नैनोग्राम हो गई है वही ओजोन की मात्रा जो सामान्यतया 40 से 50 पीपीबीवी(PPBV) होती है वो बढ़कर 115 PPBV मापी गई है जो कि हिमालय के लिये बहुत ही घातक है इन्ही तमाम सारी घटनाओं पर एरीज के वैज्ञानिक वायुमंडल में पैनी नजर बनाये हुवे है हर रोज गैसों की मात्रा का आंकलन किया जा रहा है।
डॉ एम के नजा बताते है इन बड़ी हुई गैसों का दुष्प्रभाव इंसानों के अलावा जीव जंतुओं व पेड़ पौंधों की ग्रोथ पर भी पड़ रहा है साथ ही ग्लेशियरों पर भी इनका दूरगामी प्रभाव पड़ना तय है।
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आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज कुमाऊं रीजन में पिछले 20 वर्षो में जंगलों में लगी आग से नुकसान व गैसों की मात्रा पर बड़ा शोध करने जा रहा है ताकि वायुमंडल में जंगलों की आग से उत्पन्न घातक गैसों के उत्सर्जन पर सटीक जानकारी मिल सके।
अपने शोध से एकत्र डेटा को एरीज भारत सरकार के समक्ष रखेगा जिससे कि पहाड़ों के लिये कोई ठोस प्लान बने।

उत्तराखंड