महान व्यक्तित्व और हमारे हीरो कॉर्बेट साहब को जन्मदिन की बहुत बधाई

महान व्यक्तित्व और हमारे हीरो कॉर्बेट साहब को जन्मदिन की बहुत बधाई

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रिपोर्ट- नैनीताल
नैनीताल- जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क से सभी भली भाँति परिचित होंगे पर कम ही लोग जानते होंगे कि इस पार्क को ये नाम कैसे मिला और किस इंसान के नाम पर मिला.
जेम्स एडवर्ट जिम कॉर्बेट जिन्होंने दर्जनों आदमखोर बाघ और तेंदुओं का शिकार किया था इनके ही प्रयासों से ही देश को पहला नेशनल पार्क मिला था।
देश के पहले नेशनल पार्क की स्थापना 8 अगस्त १९३६ को हेली नेशनल पार्क के तौर पर की गई थी लेकिन १९५६ में कॉर्बेट के प्रति सम्मान ज़ाहिर करते हुए इस पार्क का नाम उनके नाम पर जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रखा गया।

आइए जानते हैं कि जिम कॉर्बेट के बारे में:…
जिम कॉर्बेट का जन्म आज ही के दिन यानी 25 जुलाई 1875 में नैनीताल में ही हुआ था उन्हें पर्यावरण रक्षक के रूप में जाना जाता है। उन्हें ब्रिटिश इंडियन ऑर्मी में कर्नल की रैंक प्राप्त थी।
जिम का निधन 19 अप्रैल 1955 को केन्या में हुआ था। पहाड़ और जंगल में रहने की वजह से वह जानवरों को उनकी आवाज से पहचान लेते थे उन्हें पर्यावरण और पशु-पक्षियों से काफी लगाव भी था।
जिम कॉर्बेट शिकारी होने के साथ ही एक बेहतरीन लेखक थे उन्होंने अपनी शिकार कथाओं के साथ ही जंगल की समझ देतीं मशहूर किताबें लिखीं शिकार के दौरान कॉर्बेट ऐसे पेड़ के नीचे सोते थे जिस पर लंगूर हों क्योंकि उन्हें पता था कि आदमखोर बाघ अगर आया तो लंगूर चुप नहीं रहेंगे… या कभी भैंसों के बाड़े में जाकर रात में झपकियां लेते थे क्योंकि आदमखोर की आहट दूर से ही भांपकर भैंसों में भी हलचल होती थी… इसी तरह के कई बेजोड़ अनुभव बांटने वाले कॉर्बेट के कुछ चुनिंदा, दिलचस्प और खास प्रसंग जानें।

साल 1906 की बात है जब कॉर्बेट की विलक्षण शिकार प्रतिभा के चर्चे दूर दूर तक हो रहे थे तब उनके एक शिकारी दोस्त ने उन्हें एक शिकार के लिए प्रेरित किया क्योंकि यह शिकार लोगों के भले के लिए किया जाना था उस दौरान चंपावत की एक आदमखोर बाघिन नेपाल की सीमा में 200 लोगों की मौत का कारण बन चुकी थी और जब इसे वहाँ से खदेड़ा गया तो भारत में इस आदमखोर बाघिन ने 234 लोगों को अपना निवाला बना लिया इस आदमखोर बाघिन का शिकार करने में आर्मी सहित कई शिकारी नाकाम रह चुके थे।
कई चर्चाओं के बाद कॉर्बेट ने मंत्रालय से संपर्क किया और चंपावत की इस आदमखोर बाघिन के शिकार के लिए शर्तें रखीं पहली कि उस बाघिन के शिकार पर रखा गया इनाम हटाया जाए और दूसरी सारे शिकारियों को जंगल से वापस बुलाया जाए और इस पर मंत्रालय राज़ी हो गया। कॉर्बेट को कुछ महीने लग गए उस बाघिन की निगरानी में और इस बीच वह और लोगों को शिकार बनाती रही आख़िरकार कॉर्बेट को उसे मारने में सफलता मिल गई और एक गोली मारकर उस बाघिन का शिकार कर लोगों में फैला आतंक दूर किया।
रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ जिम कॉर्बेट द्वारा मार दिये जाने से पहले वह १२५ से ज्यादा लोगों की जान ले चुका था और मारे गए पुशओं की तो कोई गिनती ही न थी।
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जिम कॉर्बेट के शिकार के कई किस्से किंवदंती बन चुके हैं. पवलगढ़ टाइगर की बात हो या चौगरथ टाइगर की, कई आदमखोर बाघ-बाघिनों और तेंदुओं के शिकार का श्रेय कॉर्बेट के खाते में रहा और शिकारी के रूप में उनकी कीर्ति की वजह बना. कुछ किताबों में इस तरह के ज़िक्र मिलते हैं कि कॉर्बेट एक या दो सहयोगियों और एक बंदूक के साथ जंगल में घुस जाते थे और आदमखोर के शिकार के लिए लंबा इंतज़ार करते थे। कई सहयोगी और स्थानीय लोग उनके इस जोखिम के कायल हुए बगैर नहीं रह पाते थे ये भी दिलचस्प है कि कॉर्बेट अक्सर लोगों को बचाने के लिए शिकार करते थे और कोई रकम नहीं लेते थे उन्हें सड़क से संसद तक धन्यवाद दिया जाता था।
शिकारी होने के साथ ही कॉर्बेट ने बाघों पर उस समय जो अध्ययन किया था, वह भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए भी बहुत नया था मसलन, चंपावत टाइगर के शिकार के बाद कॉर्बेट ने मुआयना कर यह जानना चा​हा कि वो बाघिन आदमखोर क्यों हो गई थी. तब उन्होंने पाया कि कुछ साल पहले किसी ने उसके मुंह में गोली मारी थी, जिसकी वजह से उसके दांत विक्षत हो चुके थे इसलिए वह जंगल में सामान्य रूप से जीवों का शिकार नहीं कर पा रही थी।
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बाघों के बर्ताव, उनके संरक्षण और प्रकृति यानी जंगल के बाकी जीव जंतुओं को लेकर उनके अध्ययन ने कई परतें खोलीं और यह जागरूकता भी फैलाई कि किस तरह वन्यजीवों का संरक्षण किया जाना चाहिए और यह क्यों ज़रूरी है।
जब नैनीताल की सीमा में तत्कालीन व्यवस्था ने भारत के पहले नेशनल पार्क यानी हेली नेशनल पार्क की स्थापना की, तब उसके पीछे कॉर्बेट का बड़ा सहयोग और नज़रिया था. कॉर्बेट के इस कदम से उनके कई शिकारी दोस्त नाराज़ भी हुए थे क्योंकि उन्होंने शौकिया शिकार को एक तरह से प्रतिबंधित करने का काम करवाया था।

बाघों के बर्ताव, उनके संरक्षण और प्रकृति यानी जंगल के बाकी जीव जंतुओं को लेकर उनके अध्ययन ने कई परतें खोलीं और यह जागरूकता भी फैलाई कि किस तरह वन्यजीवों का संरक्षण किया जाना चाहिए और यह क्यों ज़रूरी है. जब नैनीताल की सीमा में तत्कालीन व्यवस्था ने भारत के पहले नेशनल पार्क यानी हेली नेशनल पार्क की स्थापना की, तब उसके पीछे कॉर्बेट का बड़ा सहयोग और नज़रिया था. कॉर्बेट के इस कदम से उनके कई शिकारी दोस्त नाराज़ भी हुए थे क्योंकि उन्होंने शौकिया शिकार को एक तरह से प्रतिबंधित करने का काम करवाया था।
ब्रितानी कवि और लेखक मार्टिन बूथ ने जब जिम कॉर्बेट की जीवनी लिखी तो उसका शीर्षक रखा ‘कारपेट साहिब’. इसकी वजह यही थी कि वह स्थानीय लोगों के बीच इसी नाम से मशहूर रहे थे. अस्ल में, पहाड़ी लोग उनका नाम ठीक से नहीं बोल पाते थे इसलिए 20वीं सदी की शुरूआत में शेर सिंह नेगी जैसे उनके शिकार सहयोगियों ने उन्हें कारपेट साहिब कहना शुरू किया था और धीरे धीरे इसी नाम से वह लोकप्रिय हो गए थे। यह भी दिलचस्प है कि केन्या जाने से पहले कॉर्बेट जो बंदूक शेर सिंह को दे गए थे, वह अब भी शेर सिंह के खानदान के पास सुरक्षित है. कॉर्बेट की अमिट याद के तौर पर।।।।
उक्त आलेख के लेखक प्रसिद्ध वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर दीप रजवार की कलम से।।।।

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