सड़कों पर स्वर लहरी- दो जून की रोटी के लिये सड़क पर गाना सुनाते कलाकार

सड़कों पर स्वर लहरी- दो जून की रोटी के लिये सड़क पर गाना सुनाते कलाकार

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रिपोर्ट- नैनीताल
नैनीताल– “मुसाफिर हूं यारो न घर है ना ठिकाना।
मुझे चलते जाना है बस चलते ही जाना है।।” फिल्म परिचय का ये गाना न जाने कितने लोगों के जीवन की हकीकत को बयां करता है।
आज नैनीताल की सड़कों पर चलते-चलते जब संगीत की स्वर लहरियां सुनाई दी,दो जून की रोटी के लिये जब सड़क पर गाना सुनाते हुवे कलाकारों को देखा तो ये गीत फिर याद आ गया।

एक मुसाफिर परिवार ने जब नैनीताल की सड़कों पर पहाड़ी गानों के साथ ढोल की थाप दी तो चलने वालों के कदम रुक गये 23 वर्षीय अबरे करम उनकी पत्नी गुड़िया और छोटी सी बच्ची जन्नत एक ऐसा परिवार जो सड़कों पर अपनी कला प्रदर्शित करते है ये इनका पेशा है।
मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले इस परिवार ने जब कुमाऊँनी गाने सुनाये तो सड़क पर मानो समां बांध दिया।
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इनकी आवाज में दर्द भी है और मिठास भी और इनके गीत व ढोल की थाप के बीच नन्ही जन्नत के ठुमके उसके आज और भावी जीवन के संघर्ष की तस्वीर भी दिखा रहे थे।
आज सरकारों को गैर सरकारी संगठनों को जरूरत है ऐसे कलाकारों को चिन्हित कर उनके परिवारों के लिये कुछ करने की ताकि इनके बच्चों का जीवन सड़क पर नही बल्कि अच्छी शिक्षा के साथ एक अच्छे मुकाम तक पहुंचे।।।

उत्तराखंड